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झारखंड में परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही हेमंत सरकार ने बड़ा दांव खेला है। सरकार ने आशंका जताई है कि परिसीमन के तहत आदिवासी सीटों की संख्या कम हो सकती है। इससे राज्य में आदिवासी सुरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों पर जनजातीय समुदाय के प्रतिनिधित्व को झटका लग सकता है। अभी राज्य में लोकसभा की पांच और विधानसभा की 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं।

रांची। झारखंड में अगले वर्ष 2026 में परिसीमन प्रस्तावित है। इसके तहत नए सिरे से लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्निर्धारण होगा। इस प्रक्रिया की सुगबुगाहट होते ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का भी दौर आरंभ हो गया है।

इसकी झलक विधानसभा में देखने को मिल चुकी है, जब कल्याण विभाग के अनुदान बजट के दौरान हेमंत सरकार के मंत्रियों ने भाजपा के खिलाफ नए सिरे से मोर्चा खोल दिया।

आशंका प्रकट की गई कि परिसीमन के तहत सीटों के निर्धारण में आदिवासी सीटों की संख्या घटाई जा सकती है। ऐसे में राज्य में आदिवासी सुरक्षित लोकसभा और विधानसभा पर जनजातीय समुदाय के प्रतिनिधित्व को झटका लग सकता है।

अभी राज्य में लोकसभा के पांच और विधानसभा की 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं और आदिवासी सीटों पर पूरी तरह सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस का दबदबा है।

आदिवासी सुरक्षित सीटों पर झामुमो का दबदबा

पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में सभी पांच आदिवासी सुरक्षित सीटों पर झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने कब्जा जमाया था, जबकि विधानसभा चुनाव के दौरान 28 में से 27 सीटें गठबंधन को अपने पाले में लाने में सफलता मिली थी। सिर्फ एक आदिवासी सुरक्षित विधानसभा सीट सरायकेला भाजपा के पास है। इस सीट पर झामुमो से भाजपा में आए पूर्व सीएम चंपई सोरेन ने जीत हासिल करने में सफलता पाई थी।

ऐसी परिस्थिति में परिसीमन में सीटों की प्रकृति में बदलाव का सीधा असर पड़ेगा। इसके बहाने सत्तारूढ़ गठबंधन भाजपा पर आदिवासी विरोधी के आरोप को और धार देने की तैयारी में है तो इसका सीधा लाभ भी उसे प्राप्त होगा। ऐसी परिस्थिति भाजपा को असहज करने को काफी होगी। अभी से ही सीटें कम होने की आशंका प्रकट कर हेमंत सरकार ने एक बड़ा राजनीतिक दांव खेल दिया है। देखना होगा कि भाजपा इसपर क्या रुख अपनाती है।

संताल परगना को अलग करने का विवाद भी पकड़ेगा तूल

दूसरी ओर संताल परगना को झारखंड से अलग करने की गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की मांग को भी सत्तारूढ़ गठबंधन मुद्दा बनाकर बढ़त लेने की तैयारी में है। विधानसभा चुनाव में 18 सीटों वाले इस महत्वपूर्ण प्रमंडल में इसका परिणाम भाजपा को भुगतना पड़ा है।

संताल परगना में सिर्फ एक विधानसभा सीट भाजपा के खाते में आई। एक बार फिर सांसद द्वारा सदन में इस मांग को उठाने के बाद विवाद तूल पकड़ सकता है।

झामुमो ने इसे लेकर विधानसभा चुनाव के दरम्यान आक्रामक प्रचार अभियान चलाया था कि झारखंड का बंटवारा नहीं होने देंगे। एक बार फिर इस भावनात्मक मुद्दे के इर्द-गिर्द राजनीति होने पर सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा भाजपा को घेरने की तैयारी की जा रही है।

 

आदिवासी आरक्षित सीटों की स्थिति

  • लोकसभा में 05 सीटें आरक्षित
  • विधानसभा में 28 सीटें आरक्षित
  • लोकसभा की सभी 05 आदिवासी सुरक्षित सीटें झामुमो-कांग्रेस के पास
  • विधानसभा की 28 में से सिर्फ 01 आदिवासी सुरक्षित सीट भाजपा के पास