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वन एवं पर्यावरण विभाग में मुख्यमंत्री के आदेशों का पालन नहीं हो रहा है। सेवानिवृत्त अधिकारी ओमप्रकाश को गलत तरीके से सेवा विस्तार दिया गया जबकि मुख्यमंत्री ने इस पर रोक लगाई थी। विभागीय मंत्री की आपत्ति के बाद भी मुख्य वन संरक्षक ने ओमप्रकाश की सेवा अवधि जारी रखी जिससे विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।

रांची। वन एवं पर्यावरण विभाग में मुख्यमंत्री का आदेश बेअसर रहता है। सेवानिवृत अधिकारियों-कर्मियों को सेवा विस्तार देने पर रोक के मुख्यमंत्री के निर्देश को विभागीय अधिकारी महत्व नहीं दे रहे हैं। 18-07-2024 को सेवानिवृत हुए भारतीय वन सेवा के अधिकारी ओमप्रकाश को प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने बिना उचित कारण के सेवा विस्तार दे दिया, जबकि विभागीय मंत्री और मुख्यमंत्री से इसके लिए आदेश भी नहीं लिया गया।

बाद में जब विभागीय सचिव के जरिए संचिका मुख्यमंत्री तक पहुंची तो उन्होंने इसे नियम सगत नहीं माना। बावजूद इसके ओमप्रकाश वन एवं पर्यावरण विभाग में कार्यरत हैं। पहली बार सेवा विस्तार देते हुए उन्हें विधिक मामलों का प्रभार दिया गया था, जबकि ओमप्रकाश के पास न तो विधिक मामलों को देखने का अनुभव है न ही उनके पास इससे संबंधित कानून की कोई डिग्री है।

सेवानिवृत रेंजर आनंद कुमार कहते हैं कि विभागीय मंत्री जो मुख्यमंत्री स्वयं हैं, उनके निर्देश के बाद भी संबंधित व्यक्ति को पदमुक्त नहीं किया जाना विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।

विभागीय सचिव को भी सिर्फ सूचना भेजी

ओमप्रकाश को सेवा विस्तार देते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने विभागीय सचिव को सिर्फ सूचना ही दी। जबकि सेवा विस्तार से जुड़े मामले में अंतिम निर्णय सरकार का होता है। इस सूचना पर भी विभागीय सचिव ने कई बार प्रश्न पूछे, नियम संगत नहीं होने की बात कही। लेकिन मुख्य वन संरक्षक ने इसे दरकिनार करते हुए ओमप्रकाश की सेवा अवधि जारी रखी।

मुख्यमंत्री ने सेवा विस्तार को हतोत्साहित करने को कहा

वन विभाग के मंत्री और मुख्यमंत्री के निर्देश पर सरकार के अवर सचिव सुनील ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक को पत्र भेजा है। इसमें ओमप्रकाश को दिए सेवा विस्तार के संदर्भ में मुख्यमंत्री के निर्देश को कोट किया गया है।

इसमें कहा गया है कि- सेवानिवृत हो रहे पदाधिकारियों को इच्छानुसार संविदा पर रखने या सेवा विस्तार के प्रस्ताव नियम संगत नहीं है। इस प्रक्रिया को हतोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है। इतने स्पष्ट आदेश के बाद भी संबंधित अधिकारी को किस नियम के तहत कार्यरत रखा गया है यह विभाग में चर्चा का विषय बना है।