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लखनऊ समाचार सुनील यादव

अमिताभ ठाकुर की गिरफ़्तारी के सिलसिले में लखनऊ पुलिस ने जो प्रेस नोट जारी किया है,

वो खुद ही सवालों में है।

इस प्रेस नोट में ये तो बताया गया कि ये साल 1999 का है।

मगर आश्चर्यजनक तौर पर इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया कि इसकी शिकायत कब की गई?

पुलिस को इस प्रेस नोट में ये भी लिखना चाहिए कि साल 1999 के मामले की शिकायत सितंबर 2025 में जाकर की गई,

और तत्काल एफआईआर दर्ज हो गई!

पुलिस को ये भी लिखना चाहिए कि शिकायत करने वाला व्यक्ति कौन है?

उसका इस मामले से क्या ताल्लुक़ है?

पुलिस को ये भी लिखना चाहिए कि सिविल प्रकृति के इस मामले में इतनी गंभीर धाराएँ कैसे जोड़ दी गईं?

पुलिस को ये भी लिखना चाहिए कि अमिताभ ठाकुर जाँच में सहयोग कैसे नहीं कर रहे थे?

IO ने उन्हें कब बुलाया और वे कब पेश नहीं हुए?

इस प्रेस नोट की शिनाख्त सिर्फ़ इतनी है कि इसमें एक उँगली अमिताभ ठाकुर की ओर उठती है और शेष चार उंगलियां ख़ुद पुलिस की ओर!!

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